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राज
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शास्त्र तन्त्र भाषा इतिहास।
राज 2 months ago
श्रोत्रिय। मुण्डकोपनिषद भाष्य प्रथम मुण्डक द्वितीय खण्ड। ॰ गुरुमेव आचार्यं ॰ श्रोत्रियम् अध्ययनश्रुतार्थसम्पन्नं ॰ ॥१२॥ अत्रिस्मृति। जन्मना ब्राह्मणो ज्ञेयः संस्कारैर्द्विज उच्यते। विद्यया याति विप्रत्वं श्रोत्रियस्त्रिभिरेव च ॥१३८॥
राज 2 months ago
अमुक स्मृति विशेष। आर्षं धर्मोपदेशं च वेदशास्त्राऽविरोधिना। यस्तर्केणानुसंधत्ते स धर्मं वेद नेतरः ॥१२॰१०६॥
राज 2 months ago
ब्रह्मसूत्र अ॰३ पा॰१ सू॰२५ भाष्य। अयं धर्मोऽयमधर्म इति शास्त्रमेव विज्ञाने कारणम्।
राज 2 months ago
शास्त्र अथवा स्वतन्त्र। image
राज 2 months ago
पंचदशी तृप्तिदीपप्रकरणम्। लौकिकव्यवहारेऽहं गच्छामीत्यादिके बुधः। विविच्यैव चिदाभासं कूटस्थात्तं विवक्षति ॥१२॥
राज 3 months ago
सदाचार। प्र॰। किसका आचरण प्रमाण। उ॰। अमुक स्मृति विशेष द्वितीय अध्याय। सरस्वतीदृषद्वत्योर् देवनद्योर्यदन्तरम् ॰ तस्मिन्देशे य आचारः ॰ स सदाचार उच्यते ॥१८॥ क्योंकि आज सरस्वती नदी लुप्त है यह देशकाल सीमित सदाचार प्रमाण वर्तमान में अनुपलब्ध।
राज 3 months ago
प्र॰। आचार्य कौन। उ॰। अमुक स्मृति विशेष अ॰२ सू॰१४० । ॰ यः शिष्यं वेदमध्यापयेद्द्विजः ॰ तमाचार्यं प्रचक्षते।
राज 3 months ago
बृहदारण्यकोपनिषद २॰१ भाष्य। ॰ मुख्यब्रह्मविदा अजातशत्रुणा अमुख्यब्रह्मविद्गार्ग्यो ॰ ॥१४॥ प्रतिलोमं ॰ उपगच्छेत् शिष्यवृत्त्या ॰ एतदाचारविधिशास्त्रेषु निषिद्धम्। तस्मात् तिष्ठ त्वम् आचार्य एव सन्। विज्ञपयिष्याम्येव त्वामहम् ॥१५॥ अर्थात शास्त्र निषेध मानकर गुरु बने बिना विज्ञप्त किया।
राज 3 months ago
भाष्यकार की जय हो। image
राज 3 months ago
महाभारत। इतिहासपुराणाभ्यां वेदं समुपबृंहयेत्। आदिपर्व प्रथम अध्याय २६७।
राज 3 months ago
सनत्सुजातीय भाष्य। परमकारुणिकः सर्वज्ञः सन् ब्रह्मविद्यां विशिष्टाधिकारिविषयां मन्वानः ॰ अमुकयोनिजत्वादौपनिषदब्रह्मात्मतत्त्वज्ञाने नाहमधिकृतः। अर्थात ज्ञान से अधिकार प्राप्त नहीं होता।
राज 3 months ago
धर्म की जय हो। image
राज 3 months ago
अद्य गुरुवार विश्वावसु कार्तिक शुक्ल द्वितीया।
राज 3 months ago
अर्थात यथेष्टचेष्टा अथवा अवैदिक आचरण से नास्तिकता बढेगी लोकसंग्रह के विपरीत।
राज 3 months ago
ब्रह्मसूत्र अ॰२ पा॰३ सू॰४८ भाष्य। न च नियोगाभावात् सम्यग्दर्शिनो यथेष्टचेष्टाप्रसंगः॥ अर्थात स्वेच्छाचारी प्रवृत्ति हो तो सम्यग्दर्शी नहीं।
राज 3 months ago
मतंगेश्वरमाहात्म्य। वर्णाश्रमेषु विद्विष्टाः पाषंडवचने रताः। निर्मर्यादा निराचारा निःशंकाश्चातिलोलुपाः। निर्घृणाः क्रूरकर्माणो धृष्टाः कलियुगे नराः। दर्शनात्तस्य लिंगस्य तेऽपि यांति त्रिविष्टपम्। स्कन्दमहापुराण।