मतंगेश्वरमाहात्म्य। वर्णाश्रमेषु विद्विष्टाः पाषंडवचने रताः। निर्मर्यादा निराचारा निःशंकाश्चातिलोलुपाः। निर्घृणाः क्रूरकर्माणो धृष्टाः कलियुगे नराः। दर्शनात्तस्य लिंगस्य तेऽपि यांति त्रिविष्टपम्। स्कन्दमहापुराण।
राज
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शास्त्र तन्त्र भाषा इतिहास।
तैत्तिरीयोपनिषत् शीक्षावल्ली ११॰२ भाष्य। ॰ नियमेन कर्तव्यानीत्येतत्। नो इतराणि विपरीतान्याचार्यकृतान्यपि॥
पंचदशी चित्रदीपप्रकरणम्। श्रुतिस्मृती ममैवाज्ञे इत्यपीश्वरभाषितम् ॥१७९॥
पाणिनीयशिक्षा। हस्तहीनं योऽधीते स्वरवर्णविवर्जितम्। ऋग्यजुःसामभिर्दग्धो वियोनिम् अधिगच्छति ॥५४॥
प्र॰। गुरु कौन। उ॰। अमुक स्मृति विशेष अ॰२ सू॰१४२ । ॰ स विप्रो गुरुरुच्यते॥ सूत संहिता मुक्तिखण्डम् अ॰५ सू॰७ । अमुक च तथा अमुक गुरुत्वं न कदाचन॥
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प्र॰। शिष्य कौन। उ॰। ब्रह्मसूत्र १॰३॰३४ भाष्य। उपनयनपूर्वकत्वाद्वेदाध्ययनस्य। उपनयनस्य च वर्णत्रयविषयत्वात्।
छान्दोग्य ५॰१०॰७ भाष्य। ॰ योनिमापद्येरन् प्राप्नुयुः ॰ स्वकर्मानुरूपेण। स्मृत्यादि शास्त्र के नियम इसके अनुरूप प्रतीत होते हैं।
कुतर्क दोहराने से तार्किक नहीं बनता।
अधर्म का नाश हो। अधर्मियों का किसी भी प्रकार मोक्ष हो जाए कोई समस्या नहीं। पर इससे उनका अधर्म धार्मिक नहीं बनता।
बातचीत की जय हो।


आगे मेरा कोई कर्तव्य नहीं।
विदुर उवाच। ॰अमुक॰योनावहं जातो नातोऽन्यद्वक्तुमुत्सहे। ॰॥ ब्राह्मीं हि योनिमापन्नः सुगुह्यमपि यो वदेत्। न तेन गर्ह्यो देवानां तस्मादेतद्ब्रवीमि ते ॥६॥ उद्योगपर्व अ॰४१ । सनत्सुजातीयभाष्य में आगे के बातों को औपनिषदिक मोक्षार्थ तत्त्वज्ञान बताया गया है। अर्थात पंचम वेद महाभारत का यह वेदान्त सब के लिए है। शास्त्र अनुमत सार्वजनिक ज्ञानकाण्ड है।
छान्दोग्यभाष्य ४॰४॰४ । विज्ञातकुलगोत्रः शिष्य उपनेतव्य॥ ब्रह्मसूत्रभाष्य १॰३॰३४ । जाति॰अमुक॰स्यानधिकारात्। अर्थात अधिकार जातिगत है॥ ब्रह्मसूत्रभाष्य १॰३॰३८ । इतिहासपुराणाधिगमे चातुर्वर्ण्यस्याधिकारस्मरणात्। अर्थात सब के लिए इतिहासपुराण का अधिकार है॥
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अथर्व ११॰५ । यहाँ ब्रह्मचारी पुरुष तथा ब्रह्मचर्य पालन करती कन्या का कथन है। सूत्र सत्रह के सायणभाष्य में ब्रह्मचारी द्वारा वेदाध्ययनार्थ कृत कुछ कर्मों को ब्रह्मचर्य माना गया। अर्थात वेदाध्ययन स्वयम ब्रह्मचर्य नहीं। इन्द्रिय संयम उपवासादि व्रत ब्रह्मचर्य के उदाहरण। तथा स्पष्टतः कन्या के लिए पति प्राप्त्यर्थ ये कर्म विहित है वेदाध्ययनार्थ नहीं। स्मृत्यादि शास्त्र में अमुक संस्कार विशेष के नियम इस के अनुरूप ही प्रतीत होते हैं।
ऐतरेय। स्कन्दपुराण महेश्वरखण्ड कुमारिकाखण्ड अ॰४२ सू॰२६ । अत्र तीर्थवरे पूर्वमैतरेय इति द्विजः।
उद्धृतव्य। शास्त्र के सम्बन्ध में अनेक भ्रम तथा कुतर्कों का खण्डन धर्मालोक पुस्तक सरणी में दशकों पूर्व किया गया है। भाषा हिन्दी। अभिलेखालय जालस्थान पर इसके अंकीय संस्करण उपलब्ध हैं।
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कवषऐलूष। ऐतरेयब्राह्मण पं॰२ अ॰३ ख॰१ सायणभाष्य। दास्याः पुत्रः इत्युक्तिरधिक्षेपार्थः। कितवः द्यूतकारः तस्माद् अब्राह्मणोऽयम्। ॰। इमं कवषं देवाः सर्वेऽपि विदुः विजानन्त्येव। अतोऽस्य कितवत्वादिदोषो नास्ति॥ अर्थात ये सब गालियाँ द्यूतक्रीडा के कारण। यह आक्रोश अथवा निन्दार्थ शब्द प्रयोग काशिका ६॰३॰२२ पुत्रेऽन्यतरस्याम् तथा २॰२॰६ नञ की महाभाष्य कैयट व्याख्या में विदित हैं॥ ब्रह्मपुराण गौतमीमाहात्म्ये अ॰६९ सू॰२। पैलूष इति विख्यातः कवषस्य सुतो द्विजः।
जाबाल। छान्दोग्यभाष्य अ॰४ ख॰४ सू॰५। ऋजवो हि ब्राह्मणा नेतरे स्वभावतः। यस्मान्न सत्याद्ब्राह्मणजातिधर्मादगा नापेतवानसि॥ यहाँ ब्राह्मण जाति माना गया है॥ मेधातिथि स्मृतिभाष्य अ॰१० सू॰५। गौतमस्यापि न ततो वचनाद्ब्राह्मणोऽयमित्यवगमः। प्रागेवासौ तं ब्राह्मण इति वेद। गोत्रं तु न वेद। गोत्रप्रश्नेन चरणप्रश्नो वेदितव्यः। तत्र उपनयनभेदोऽस्ति। न तु गोत्रभेदेनोपनयने प्रयोजनम्।