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राज
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शास्त्र तन्त्र भाषा इतिहास।
राज 9 months ago
प्र॰। अमुक स्मृति विशेष के दसवाँ अध्याय चालीसवाँ तथा सत्तावनवाँ सूत्रों में कहा गया है कि वर्ण अज्ञात हो तो उसे कर्मों से जाना जा सकता है। यह कैसे। उ॰। इन सूत्रों का प्रसंग केवल वर्णभ्रष्ट अथवा अवर्ण समाज प्रतीत है। अर्थात जिनका धार्मिक कर्मों में कोई विशेष अधिकार नहीं।
राज 9 months ago
प्र॰। ब्राह्मण कौन। उ॰। व्याकरणमहाभाष्यम्। अ॰२ पा॰२ सू॰६ । तपः श्रुतं च योनिश्चेत्येतद् ब्राह्मणकारकम्। तपःश्रुताभ्यां यो हीनो जातिब्राह्मण एव सः। अमुक स्मृति विशेष के द्वितीय अध्याय एकसौतीसरा सूत्र का तात्पर्य भी यही है। अमुक यक्षप्रश्न का भी।
राज 9 months ago
अनुवादक। यूट्यूब पर कुछ मासों से जानकारी वर्ग चलचित्र प्रणालियों के लिए आंग्ल से हिन्दी ध्वनि अनुवादक सुविधा उपलब्ध है। व्याकरण के कुछ विषय अतिरिक्त अनुवाददोष अधिक नहीं। विज्ञान तन्त्रज्ञान शब्दावली के लिए कुछ स्तर तक संस्कृत शब्द प्रयुक्त हैं। पर अनेक विदेशी शब्द भी ज्यों के त्यों प्रयुक्त हैं। इसके लिए शोधनात्मक न्यूनीकरण प्रक्रिया चलती रहनी चाहिए।
राज 10 months ago
आचरण प्रवचन भेद। वैदिक समाज मूलतः वैदिक है वेदादिशास्त्र की मान्यता से तथा आचरण से। अर्थात आचरण प्रवचन में साम्यता। शास्त्र विरुद्ध दो स्पष्ट उदाहरण हैं सांख्य तथा बौद्ध॥ सांख्य सिद्धपुरुष। ब्रह्मसूत्रभाष्य। अ॰२ पा॰१ सू॰१ । ततश्च पूर्वसिद्धायाश्चोदनाया अर्थो न पश्चिमसिद्धपुरुषवचनवशेनातिशंकितुं शक्यते। अर्थात किसी सिद्धपुरुष के शास्त्र विरोधी मत मान्य नहीं शास्त्र ही मान्य। ये है शास्त्र सम्मत आचरण शास्त्र विरोधी प्रवचन॥ बौद्धावतार। आचरण प्रवचन दोनों शास्त्र विरोधी। इसलिए अवैदिक संप्रदाय॥ अन्ततः शास्त्र विरोधी आचरण शास्त्र सम्मत प्रवचन। ये स्पष्ट ढोंग है। प्राचीन भारत में धार्मिक क्षेत्र में ढोंग के लिए आर्थिक दण्ड का प्रावधान था।
राज 10 months ago
यथाशास्त्रम्। शास्त्रानुसारे शास्त्रानतिक्रमे च॥
राज 10 months ago
प्र॰। इस प्रसंग में स्थूल शरीर क्या है। उ॰। विवेकचूडामणि। पंचीकृतेभ्यो भूतेभ्यः स्थूलेभ्यः पूर्वकर्मणा। समुत्पन्नमिदं स्थूलं भोगायतनमात्मनः ॥९०॥ अर्थात पूर्वकर्मों के फल भोगने के लिए उत्पन्न यह भौतिक शरीर।
राज 10 months ago
विवेकचूडामणि। विद्धि देहमिदं स्थूलं गृहवद्गृहमेधिनः॥ स्थूलस्य संभवजरामरणानि धर्माः स्थौल्यादयो बहुविधाः शिशुताद्यवस्थाः। वर्णाश्रमादिनियमा बहुधाऽमयाः स्युः पूजावमानबहुमानमुखाविशेषाः ॥९३॥ अर्थात वर्णाश्रम के नियम स्थूल शरीर का है।
राज 10 months ago
विवेकचूडामणि। ब्रवीतिश्रुतिरेतस्य प्रराब्धंफलदर्शनात् ॥४४६॥ गीताभाष्य। सामर्थ्यात् येन कर्मणा शरीरम् आरब्धं तत् प्रवृत्तफलत्वात् उपभोगेनैव क्षीयते।
राज 11 months ago
स्मर्त्तव्य। बन्धमोचनकर्त्तातुस्वस्मादन्योनकश्चन। प्रारब्धकर्मणांभोगादेवक्षयइति। image
राज 11 months ago
कालः। अद्य शुक्रवार विश्वावसु ज्येष्ठ कृष्ण एकादशी। शकान्त १९४७ वर्षगत पूर्णिमान्त ०३ कृष्ण ११ । चन्द्र उत्तरभाद्रपद। सूर्य वृषभ ग्रीष्म उत्तरायण देवयान। बृहस्पति मिथुन।
राज 11 months ago
विवेकचूडामणि। तस्मान्मनः कारणमस्य जन्तोः बन्धस्य मोक्षस्य च वा विधाने। बन्धस्य हेतुर्मलिनं रजोगुणैर्मोक्षस्य शुद्धं विरजस्तमस्कम् ॥१७६॥ मनः प्रसूते विषयानशेषान्स्थूलात्मना सूक्ष्मतया च भोक्तुः। शरीरवर्णाश्रमजातिभेदान् गुणक्रियाहेतुफलानि नित्यम् ॥१७९॥
राज 11 months ago
कीटोपाख्यान। महाभारते अनुशासनपर्वणि। मोक्ष के मार्ग में कीट भी। ततःसालोक्यमगमद्ब्रह्मणोब्रह्मवित्तमः। अवापचपदंकीटःपार्थब्रह्मसनातनम्। स्वकर्मफलनिर्वृत्तंव्यासस्यवचनात्तदा।
राज 11 months ago
स्मर्त्तव्य। कौटसाक्ष्यं तु कुर्वाणां ॰ ब्राह्मणं तु विवासयेत्। भृगुप्रोक्त अष्टमोऽध्याय एकसौतेईसवाँ सूत्र।
राज 0 years ago
स्वप्रयत्न। श्रीगुरुरुवाच। ऋणमोचनकर्तारः पितुः सन्ति सुतादयः। बन्धमोचनकर्त्ता तु स्वस्मादन्यो न कश्चन॥ मस्तकन्यस्तभारादेर्दुःखमन्यैर्निवार्यते। क्षुधादिकृतदुःखं तु विनास्वेन न केनचित्॥ पथ्यमौषधसेवा च क्रियते येन रोगिणा। आरोग्यसिद्धिर्दृष्टास्य नान्यानुष्ठितकर्मणा॥ विवेकचूडामणि में।
राज 1 year ago
आयशरीरम्। समाहर्ता दुर्गं राष्ट्रं खनिं सेतुं वनं व्रजं वणिक्पथं चावेक्षेत। शुल्कं दण्डः इत्यादि दुर्गम्। भागो करो इत्यादि राष्ट्रम्॥ धान्यषड्भागं पण्यदशभागं हिरण्यं चास्य भागधेयं प्रकल्पयामासुः॥ बाह्यमाभ्यन्तरं चातिथ्यं निष्क्राम्यं प्रवेश्यं च शुल्कम्। प्रवेश्यानां मूल्यपंचभागः। द्वारादेयं शुल्कपंचभागः॥ इतिकौटलीयार्थशास्त्रे॥
राज 1 year ago
प्रारब्ध। अर्थात आरम्भ किया हुआ। शरीरारम्भकादृष्टविशेषः॥ अवश्यमेव भोक्तव्यं कृतं कर्म शुभाशुभम्। पुराणों में। ज्ञानाग्निः सर्वकर्माणि भस्मसात्कुरुते तथा। गीता में। प्रारब्धकर्मणां भोगादेव क्षय इति। तत्त्वबोध में॥ निष्कर्षतः। पाप के नाश से प्रवृत्ति का नाश नहीं। प्रवृत्ति के नाश से प्रारब्ध का नाश नहीं।